मूंग की फसल पर सफेद मक्खियों से रोग फैल रहा है। ये मक्खियां जिस पत्ते पर बैठतीं हैं वहां विषाणु छोड़ दे रही हैं। फिर धीरे धीरे पूरे खेत में लगी फसल पीली होती जा रही है। पत्तियों के साथ इसमें लगनेवाली फली भी पीली हो जाती है। इससे फलियों के दाने छोटे छोटे हो जाते हैं, जिससे उत्पादन में भारी गिरावट आने की आशंका है।जिले में करीब 10 हजार एकड़ में मूंग की बुआई की गयी है। इस पीला मोजैक रोग पर नियंत्रण नहीं होने पर दाल के उत्पादन में भारी गिरावट आ सकती है।
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बचाव के लिए जरूरी है कि बुआई के 35 दिनों तक कोई भी रोगग्रस्त पौधा दिखने पर उसे उखाड़कर मिट्टी में गाड़ देना चाहिए। अगल बगल के किसानों को भी मूंग फसल पर नजर रखनी चाहिए।
इसके अलावा प्रभावित मूंग फसल पर ट्राइजोफॉस 40 ईसी या मैलाथियान 50 ईसी कीटनाशी दवा की 2 मिली मात्रा प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए। दस से पंद्रह दिनों के अंतराल पर दो से तीन छिड़काव कर मूंग फसल को रोग से बचाव किया जा सकता है। कृषि विज्ञान केन्द्र पिपराकोठी के कृषि वैज्ञानिक ने किसानों से प्रभावित फसल पर तुरंत दवा का छिड़काव शुरु करने की सलाह दी है।
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इसके अलावा प्रभावित मूंग फसल पर ट्राइजोफॉस 40 ईसी या मैलाथियान 50 ईसी कीटनाशी दवा की 2 मिली मात्रा प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए। दस से पंद्रह दिनों के अंतराल पर दो से तीन छिड़काव कर मूंग फसल को रोग से बचाव किया जा सकता है। कृषि विज्ञान केन्द्र पिपराकोठी के कृषि वैज्ञानिक ने किसानों से प्रभावित फसल पर तुरंत दवा का छिड़काव शुरु करने की सलाह दी है।